सोमवार, २३ मार्च, २०२०

हुस्सैनीवाला - शहादत की सरज़मीं















भगतसिंगसुखदेव और राजगुरु - इन तीन नामों के बगैर भारत की स्वतंत्रता का इतिहास शायद 
अधूरा हैब्रिटीश राज के खिलाफ उनकी लड़ाई और प्राणों का बलिदान उनको मानो अमर
कर गया है.
ये तो हम जानते ही है के कैसे आक्रोश मचा था पूरे भारत में उनकी सज़ा को सुनकरलाहोर में तो 
विद्रोह के आसार नज़र  रहे थे जहाँ की कोट लखपत जेल में उन को बंदी बनाके रखा था,
जिसके चलते एक दिन पहले ही उनको फाँसी दी गयी
और फिर बताया गया के रात के अंधकार में उनके अंतिम संस्कार भी कर दिए एक नदी के किनारे, परीजनों और दोस्तों को बिन पूछेबिनबताए

अगर पार्थिव को बिना क्रियाकर्म आग के हवाले के करना और फिर लोगो के डर के मारे उसको 
नदी में बहाँ देनाशायद बरतानवी भाषामें इस को अंतिम संस्कार कहते होंगेहम तो इसे 
विटंबना ही मानेंगेयह बात अलग है के शहीद किसी संस्कार के मोहताज नहींवो तो संस्कारो की धरोहर छोड़ जाते है.  

तो यह अंतिम संस्कार जहाँ किए गये वो जगह है हुस्सैनीवालासतलज नदी के किनारेज़्यादातर लोग 
मान के चलते है के जब फाँसी हुई थी लाहौर में तो यह स्थल भी वही कहीं आसपास होगायानी आज के पाकिस्तान मेंऔर था भीपार्टीशन के दौरान हुस्सैनीवाला पाकिस्तान के हिस्से में ही आया था

कुछ सालों बाद भारत सरकार ने पाकिस्तान से एक आदान प्रदान किया जिसके चलते फाज़िल्का 
जिले के १२ गाँव पाकिस्तान को दिए गये और इस जगह का ऐतिहासिक महत्व जान कर 
इसे भारत में शामिल किया गया१९५१ में तत्कालीन संरक्षण मंत्री श्रीवायबीचव्हान ने फिर नींव रक्खी समाधीस्थल की

एक अलग ही एहसास है यह जगह  मानो जैसे भगतसिंगराजगुरु और सुखदेव की रूह कह रही है

कभी वह दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे  
जब अपनी जमी होगी और अपना आसमाँ होगा 



स्वतंत्रता संग्राम में भगतसिंग के एक साथी थे श्रीबटूकएश्वर दत्तभगतसिंग की फाँसी के दौरान 
वो क़ैद की सज़ा काट रहे थे१९६१ में आप का निधन जब दिल्ली में हुआ तो आप की इच्छा थी 
अपने साथियों के निकट चिरशांति लेने कीउनका अंतिम संस्कार भी यही पे किया गया
अतः समाधी भी बनाई गयी.  


आश्चर्य की बात तो यह है के जब की औफ़ीशियल आदान प्रदान में हुस्सैनीवाला भारत में शामिल 
किया गया था फिर भी बार बार होते रहें यहाँ पे आक्रमणआज भी आप देख सकते है तोप गोलों 
के निशान कैसर--हिंद टॉवर परजो आधा ही सही लेकिन खड़ा है सीना तान केऔर जो गवाही 
देता है अपने सैनिकों के बुलंद इरादों की और अतुलनीय शौर्य की१९५६ मे  जे  के रायफ़ल्स
१९६५ में सेकंड मराठा लाइट इन्फट्री१९७१ में १५ पंजाब डी कंपनी फोर हुस्सैनीवाला अपनी जान 
पर खेल गये थे इसके संरक्षण में१९७१ में समाधी स्थल पे ही हुई थी घमासान लड़ाई जिस में 
शहीद हुए थे  अफ़सर और ५३ सैनिकलेकिन जूझते रहे जब तक उपर से कहा कहा नही गया 
पोस्ट खाली करने कोबमबारी से पूरी तरह से समाधी को तहस नहस कर दिया गया था तब
१९७३ में पुनर्निर्माण किया गया और आज कल इसे कहा जाता है प्रेरणास्थल


समाधी स्थल जाने का रास्ता एक पुल से हो कर जाता है जिसकी एक तरफ पूरी कवर की गयी है 
लोहे के १५-२० फीट उँचे शीट लगाकरथोड़ा अजीब ही लगा देखते हुएशहर का आदतन मन तो 
कह गया इस वीराने मे काहे के साउंड बॅरियरयहा पे कौन सी होती है ट्रॅफिकफिर पता चला 
अरे उस तरफ तो पाकिस्तान है

हुस्सैनीवाला जो कभी पाकिस्तान का हिस्सा बन चुका थाआज एक बॉर्डर पोस्ट हैहालाँकी यहा 
से बॉर्डर क्रॉसिंग अब बंद कर दी गयी हैयहाँ पे रोज़ फ्लॅग रिट्रीट सेरेमनी होती हैदोनो तरफ़ 
गर्मजोशी से नारे लगते है अपने अपने देश के लिएजैसे लगते है वाघा बॉर्डर परलेकिन 
हुस्सैनीवाला की हवाओमें इस तरफ एक और नारा गूँजता है "इन्क़िलाब ज़िंदाबादऔर मन खट्टा हो
जाता है के यह नारा उस तरफ़ क्यों नही लगताआख़िर यह नारा तो दोनों के इतिहास का हिस्सा 
हैखैर

आप लोग अमृतसर जाते होंगेवाघा बॉर्डर जाते होंगेअमृतसर से सिर्फ़ .- घंटे की दूरी पे 
फ़िरोजपूर जिले में स्थित है हुस्सैनीवालायह है उत्तर रेलवे का आख़िरी छोरजहा साल में एक बार
२३ मार्च को ट्रेन चलती हैशहीदों की स्मृति में.  

कभी अमृतसर की तरफ जा रहे हो तो इस तरफ भी मूड़ जाइएगाशीश झुकाने के लिए ना सही 
तो शहीदों को बताने के लिए ही सहीके उनका सपना "आझाद भारतकाजो आज हम जी रहे 
हैउनकी बदौलतउनके दम पे


हुस्सैनीवाला - शहादत की सरज़मीं

भगतसिंग ,  सुखदेव   और   राजगुरु  -  इन   तीन   नामों   के   बगैर   भारत   की   स्वतंत्रता   का   इतिहास   शायद   अधू...